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साखी -सतगुरु हम से रीशि करि , एक कह्या प्रसंग । बरस्या बादल प्रेम का , भीजि गया सब अंग । । 1 । ।

साखी   - एक काव्य

समनदास-जी-के-प्रवचन/रविदास-जी-के-प्रवचन
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सतगुरु हम से रीशि करि , एक कह्या प्रसंग । 

बरस्या बादल प्रेम का , भीजि गया सब अंग । । 1 । ।राम नाम के पटतरे , देबे का कछु नाहिं ।  क्या ले गुर संतोषिए , हाँस रही मन माँहिं । । 2 । । 
ग्यान प्रकास्या गुर मिल्या , सो जिनि बीसरि जाइ । । जब गोविन्द कृपा करी , तब गुरु मिलिया आइ । । 3 । । माया दीपक नर पतंग , भ्रमि भ्रमि इवें पहुंत । कहै कबीर गुर ग्यान थे , एक आध उबरंत । । 4 । । 
जब मैं था तब गुरु नहीं , अब गुरु हैं हम नाहिं ।  प्रेम गली अति सॉकरी , तामें दो न समाहिं । । 5 । । 
भगति भजन हरि नावें है , दूजा दुक्ख अपार । मनसा बाचा कर्मनाँ , कबीर सुमिरण सार । । 6 । । ।
 कबीर चित्त चमंकिया , चहुँ दिसि लागी लाइ । हरि सुमिरण हाथू घड़ा , बेगे लेहु बुझाइ । । 7 । । 
अंघड़ियाँ झाई पड़ी , पंथ निहारि - निहारि । जीभड़ियाँ छाला पडूया , राम पुकारि - पुकारि । । 8 । । ।
झूठे सुख को सुख कहै , मानत हैं मन मोद । जगत चबैना काल का , कछु मुख में कछु गोद । । 9 । । 
जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नाँहिं । ।
सब अंधियारा मिटि गया , जब दीपक देख्या माँहिं । । 10 । ।

कबीर कहा गरबियौ , ऊँचे देखि अवास ।
काल्हि पयूँ भ्वै लोटणाँ , ऊपर जामै घास । । 11 । । 

यहूं ऐसा संसार है , जैसा सैंबल फूल ।
दिन दस के ब्यौहार कौं , झूठे रंग न भूलि । । 12 । । 

इहि औसरि चेत्या नहीं , पसु ज्यूँ पाली देह ।
 राम नाम जाण्या नहीं , अंति पड़ी मुख बेह । । 13 । ।  

यह तन काचा कुंभ है , लियाँ फिरे था साथि ।
 ढबको लागा फूट गया , कछु न आया हाथि । । 14 । ।  

कबीर कहा गरबियौ , देही देखि सुरंग ।
बीछड़ियाँ मिलिबौ नहीं , ज्यूँ काँचली भुवंग । । 15 । ।

    

कबीर दास


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Milan Tomic

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