प्रतिभा
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प्रतिभाएं
व्यवस्था का प्राण हैं । कोई भी व्यवस्था चाहे वह समाज व्यवस्था हो , राजनीतिक व्यवस्था हो , धार्मिक हो या फिर वर्तमान में प्रचलित कॉरपोरेट व्यवस्था हो सभी के सुसंचालन लिए एक कुशल एवं योग्य व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है । जिस व्यक्ति में अपने अंतर्गत आने वाली किसी जिम्मेदारी को सही समझदारी , साहस एवं ईमानदारी से करने की क्षमता होती है , उसे ही प्रतिभावान कहते हैं । प्रतिभा अपनी नैसर्गिकता या उपलब्ध अनुभव कुशलता अनेक प्रकार की रचनात्मकता जन्म देती । है । व्यवस्था की संरचना , ढांचा एवं आधार इन्हीं द्वारा विनिर्मित होते हैं । व्यवस्था यदि सुचारू रूप से चल रही है । तो अवश्य ही उसका संचालन किसी प्रतिभावान के हाथों होगा , अन्यथा कितनी ही श्रेष्ठ एवं संपन्न व्यवस्था क्यों न हो , चरमरा जाएगी , टूट - बिखर जाएगी । व्यवस्था और प्रतिभा , दोनों एक - दूसरे के पूरक हैं । एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है । यदि केवल व्यवस्था हो संचालन करने वाली कोई कुशल प्रतिभा न हो तो व्यवस्था लड़खड़ाएगी और यदि केवल प्रतिभा हो और उसके सामने अपनी कुशलता को क्रियान्वित करने एवं निखारने के लिए कोई कार्यक्षेत्र न हो तो वह भी एकांगी । एवं निष्क्रिय हो जाएगी । प्रतिभा होगी तो व्यवस्था अपने आप जन्म लेगी । प्रतिभा किसी व्यक्ति का नाम नहीं है , वरन साहस , शौर्य , समझदारी , जिम्मेदारी एवं ईमानदारी का प्रचंड उफान हैं ।
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प्रतिभा जहां होगी , ये सारे अनिवार्य तत्व अपने प्रबलतम एवं चरम उफान पर होंगे । ऐसे में जहां प्रतिभावानों का सम्मान न हो , कार्य करने के लिए स्वतंत्रता न हो , उनको उत्साहित करने के बजाय हतोत्साहित किया जाता हो , किसी उच्चतम आदर्श के बदले निजी एवं कुत्सित स्वार्थ में संलग्न करने का षड्यंत्र एवं कुचक्र रचा जा रहा हो तो वह तंत्र कभी भी विकसित नहीं हो सकता है । ऐसा तंत्र चाहे किसी के संरक्षण एवं सुरक्षा में क्यों न हो , कितना भी संपन्न एवं जन - धन से समृद्ध क्यों न हो , उसकी तात्कालिक सफलता पर अनेक संदेह एवं प्रश्नचिन्ह लग जाते हैं । और यही कारण हाक अपने समाज एवं देश में पनप रहे अनेक व्यवस्थ पतन पराभव हो रहा है । प्रतिभावान हमारे राष्ट्र को अमूल्य धरोहर हैं ।


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Jayda jankari kele comment kare